Brihad Hanumad Siddhi (बृहद हनुमद सिद्धि) Code-505
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Brihad Hanumad Siddhi (बृहद हनुमद सिद्धि) Code-505 - Pandit Shivdatt Mishra
Brihad Hanumad Siddhi (बृहद हनुमद सिद्धि) Code-505
बृहद हनुमद सिद्धि (Brihad Hanumad Siddhi) एक समय ऋष्यमूक पर्वत पर, केसरी नामक वानर-राज की सती- साध्वी अंजनी (अंजना) नाम की भार्या ने पुत्र-प्राप्ति के लिए आशुतोष भगवान् शंकर की उग्र तपस्या सात हजार वर्ष पर्यन्त की। उसकी तपस्या के फलस्वरूप भगवान् सदाशिव ने सन्तुष्ट होकर उसे वरदान माँगने के लिए कहा। वरस्वरूप में पुत्र-प्राप्ति के लिए शंकरजी से उसने कहा। इस पर भगवान् शिव ने इस प्रकार कहा- “हे अंजने ! हाथ फैलाकर मेरे ध्यान में. मग्न हो, आँख बन्दकर खड़ी रहो, तुम्हारी अंजलि में पवनदेव प्रसाद रखकर अन्तर्ध्यान हो जायेंगे, उस प्रसाद के खाने पर निश्चय ही एकादश रुद्रावताररूप परम तेजस्वी पुत्ररत्न तुम्हें प्राप्त होगा।” इस प्रकार कहकर भगवान् सदाशिव वहीं अन्तर्धान हो गये और अंजनी उसी स्थान पर किंकर्तव्यविमूढ हो खड़ी रही। इसी बीच चक्रवर्ती राजा दशरथ के यज्ञ में कैकेयी के हाथ से एक चील पिण्ड लेकर आकाशमार्ग में उड़ गयी। उस समय भयंकर आँधी-तूफान से वह पिण्ड चील के मुख से छूटकर वायु-द्वारा अंजनी की पसरी हुई अंजलि में गिरी। तत्क्षण उस पिण्ड को अंजनी ने खा लिया। जिसके फलस्वरूप नव मास व्यतीत होने पर अंजनी के गर्भ से चैत्र शुक्ल पूर्णिमा मंगलवार की मंगलमय वेला में मौजी, मेखला, कौपीन, यज्ञोपवीत एवं कानों में कुण्डल धारण किये हुए मूँगे के समान रक्तवर्ण वाले मुख एवं पूँछ युक्त वायुपुत्र अत्यन्त बुभुक्षित (भूखे) वानररूप में एकाएक प्रकट हुए।
Author : Pandit Shivdatt Mishra
Publisher : Rupesh Thakur Prasad Prakashan
Language : Sanskrit & Hindi
Edition : 2013
Pages : 376
Cover : Hard Cover
ISBN : 505-542-2392542
Size : 14 x 2 x 22 ( l x w x h )
Weight : 510gm
Item Code : RTP 00